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बसंत पंचमी: ज्ञान, संस्कृति और बसंत ऋतु के स्वागत का पावन पर्व

वाराणसी | 23 जनवरी 2026


आज देशभर में बसंत पंचमी का पर्व श्रद्धा, उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि भारतीय सभ्यता में ज्ञान, कला, संगीत और नवचेतना का प्रतीक भी माना जाता है। शीत ऋतु के अंत और बसंत के आगमन के साथ प्रकृति नवजीवन से भर उठती है—खेतों में पीली सरसों लहलहाती है, पेड़ों पर नई कोपलें फूटती हैं और वातावरण में उत्साह का संचार होता है।


बसंत पंचमी का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन विद्या, वाणी, संगीत और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। यही कारण है कि इस दिन माँ सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। वैदिक काल से ही इस पर्व को शिक्षा और ज्ञान के आरंभ से जोड़ा गया है। गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थियों को इसी दिन अध्ययन की दीक्षा दी जाती थी, जिसे ‘विद्यारंभ संस्कार’ कहा जाता है।


इस पर्व का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। बसंत पंचमी से शुभ कार्यों की शुरुआत को शुभ माना जाता है। विवाह, गृह प्रवेश और नए कार्यों का आरंभ इसी दिन किया जाता है। पीले रंग को बसंत का प्रतीक माना गया है, इसलिए लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं और केसर युक्त एवं पीले व्यंजन जैसे खीर, हलवा और लड्डू बनाकर प्रसाद के रूप में अर्पित करते हैं। पीला रंग ऊर्जा, ज्ञान और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।


बसंत पंचमी का साहित्य और कला से भी गहरा संबंध है। अनेक कवियों ने बसंत ऋतु को सृजन और प्रेम की ऋतु बताया है। संगीत सभाओं, कवि सम्मेलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन इस दिन विशेष रूप से किया जाता है। कुल मिलाकर, बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव है। यह पर्व हमें ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जैसे प्रकृति हर वर्ष नए रूप में खिलती है, वैसे ही बसंत पंचमी हमें आत्मिक और बौद्धिक रूप से स्वयं को निखारने का संदेश देती है।

: बसंत पंचमी: ज्ञान, संस्कृति और बसंत ऋतु के स्वागत का पावन पर्व


देशभर में आज बसंत पंचमी का पर्व श्रद्धा, उल्लास और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व शीत ऋतु के समापन और बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। प्रकृति में हरियाली, खेतों में लहलहाती सरसों और वातावरण में बढ़ती ऊष्मा नए जीवन और नई ऊर्जा का संदेश देती है।


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन विद्या, वाणी, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसलिए बसंत पंचमी को ज्ञान और शिक्षा के पर्व के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में सरस्वती पूजन का आयोजन किया गया, जहां विद्यार्थियों ने पुस्तकों और वाद्य यंत्रों की पूजा कर अध्ययन और सृजन के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।


इतिहास में भी बसंत पंचमी का विशेष महत्व रहा है। वैदिक काल से ही इस दिन को विद्यारंभ और शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए श्रेष्ठ माना जाता रहा है। कई स्थानों पर बच्चों का विद्यारंभ संस्कार इसी दिन कराया जाता है। पीला रंग बसंत का प्रतीक माना जाता है, इसलिए लोगों ने पीले वस्त्र धारण किए और केसरयुक्त व पीले व्यंजनों को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया।


सांस्कृतिक दृष्टि से भी बसंत पंचमी का महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अवसर पर संगीत सभाएं, कवि सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। बसंत पंचमी न केवल एक पर्व है, बल्कि यह आशा, ज्ञान और रचनात्मकता का उत्सव है, जो समाज को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।


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