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“सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, 9 जजों की बेंच धार्मिक भेदभाव याचिकाओं पर कर रही विचार”
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला पिछले 26 सालों से भारतीय अदालतों में मामला बना हुआ है। आज से सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 50 से अधिक पेंडिंग याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर रही है। इस सुनवाई में केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने का मुद्दा प्रमुख है, जिसे लेकर कई महिलाओं ने अपनी आवाज उठाई है।
महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का हो सवाल
सुनवाई में मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना, और गैर-पारसी पुरुषों के साथ शादी करने वाली पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों पर प्रवेश की रोक भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 7 अप्रैल को सबरीमाला रिव्यू केस की सुनवाई शुरू होगी। इससे पहले 7 से 9 अप्रैल तक रिव्यू पिटीशनरों की सुनवाई होगी।
सबरीमाला के नियमों पर बेंच की नजर
सुप्रीम कोर्ट की बेंच यह तय करेगी कि सबरीमाला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार है या नहीं। 2018 में पारित एक फैसले के तहत, महिलाओं को प्रवेश से रोका गया था, जिसे अब चुनौती दी जा रही है। इसी तरह से मस्जिदों में नमाज पढ़ने और दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना की प्रथा पर भी चर्चा होगी।
सरकार की स्थिति और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
केंद्र सरकार ने 2018 और 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया था, लेकिन बाद में उसने थोड़ा संतुलित रुख अपनाया। इस मामले को व्यापक संवैधानिक प्रश्नों का भाग मानते हुए कहा गया कि इसे संविधान पीठ द्वारा ही तय करना चाहिए। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जैन समुदाय ने भी अपने विचार रखे हैं कि धार्मिक प्रथाओं में अदालत का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
सुनवाई की प्रक्रिया और समय रेखा
इस सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को असंवैधानिक बताया है। विशेषकर उन धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाए गए हैं जो महिलाओं को अधिकारों से वंचित करती हैं। पिछले प्रक्रियाओं में कोविड-19 के कारण सुनवाई में बाधा आई थी, लेकिन अब यह मामला फिर से सुर्खियों में है।
सबरीमाला में प्रवेश के मुद्दे का महत्व
यदि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय महिला अधिकारों के पक्ष में होता है, तो यह भविष्य में धार्मिक मामलों में अदालत के हस्तक्षेप की सीमा को निर्धारित कर सकता है। इससे महिलाओं के धार्मिक अधिकारों की अन्य प्रथाओं पर भी प्रभाव पड़ेगा। इस सुनवाई को लेकर भारत के विभिन्न हिस्सों में लोग उत्सुकता के साथ देख रहे हैं।
समाज के नेताओं की चिंताएं
अखिल भारतीय संत समिति ने अदालत से निवेदन किया है कि धार्मिक मामलों में दखल केवल तब होना चाहिए जब यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हो। इसके अलावा, केरल सरकार ने पुरानी धार्मिक परंपराओं में बदलाव के लिए समाज सुधारकों से सलाह लेने की बात कही है।
क्या होगा आगे?
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, जो न केवल महिलाओं के अधिकारों के मामले को बल्कि भारत की धार्मिक परंपराओं पर भी असर डालेगी। कैसे समाज और अदालत इस मुद्दे का सामना करेंगे, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। अगले कुछ दिनों में सुनवाई का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहेगा
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