मधुमेह बनता जा रहा आर्थिक आपदा: भारत पर 946 लाख करोड़ रुपये का संभावित बोझ, 21.2 करोड़ मरीजों में से अधिकांश इलाज से वंचित

नई दिल्ली | 14 जनवरी 2026


भारत में मधुमेह अब केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े संकट के रूप में उभर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, मधुमेह के कारण आने वाले वर्षों में भारत को करीब 11.4 लाख करोड़ डॉलर यानी लगभग 946 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, जो देश की आर्थिक स्थिरता पर गहरा असर डालने वाला है।


रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में इस समय करीब 21.2 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से लगभग 62 प्रतिशत मरीजों को अब तक नियमित और समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है, बल्कि भविष्य में खर्च और नुकसान को और बढ़ा सकती है।


अध्ययन के मुताबिक मधुमेह से होने वाला नुकसान सिर्फ इलाज पर होने वाले खर्च तक सीमित नहीं है। इससे कामकाजी आबादी की उत्पादकता घट रही है, समय से पहले नौकरी छोड़ने की मजबूरी बढ़ रही है और परिवारों पर देखभाल का आर्थिक व मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इन सभी कारणों ने मिलकर मधुमेह को एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक चुनौती बना दिया है।


वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो दुनिया भर में करीब 83 करोड़ वयस्क मधुमेह से पीड़ित हैं, जिनमें से हर चौथा मरीज भारत से है। चीन इस सूची में दूसरे स्थान पर है, जहां 14.8 करोड़ लोग मधुमेह से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे, तो 2050 तक दुनिया में मधुमेह रोगियों की संख्या 130 करोड़ तक पहुंच सकती है, जो स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत 

 मधुमेह: स्वास्थ्य संकट से बढ़कर आर्थिक चुनौती, भारत पर मंडरा रहा 946 लाख करोड़ रुपये का खतरा


भारत में मधुमेह तेजी से एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनता जा रहा है, जो अब केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं रह गई है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, इस बीमारी के कारण आने वाले वर्षों में भारत को करीब 11.4 लाख करोड़ डॉलर यानी लगभग 946 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसे विशेषज्ञ एक संभावित आर्थिक आपदा के रूप में देख रहे हैं।


चिंताजनक तथ्य यह है कि देश में इस समय करीब 21.2 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, लेकिन इनमें से लगभग 62 प्रतिशत मरीजों को नियमित और पर्याप्त इलाज नहीं मिल पा रहा है। इलाज की कमी के चलते बीमारी और जटिल होती जा रही है, जिससे न सिर्फ मरीजों की सेहत प्रभावित हो रही है, बल्कि परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी गहरा असर पड़ रहा है।


रिपोर्ट में बताया गया है कि मधुमेह से होने वाला नुकसान केवल दवाइयों और इलाज के खर्च तक सीमित नहीं है। इसके चलते कामकाजी लोगों की उत्पादकता घट रही है, समय से पहले काम छोड़ने की नौबत आ रही है और घर के अन्य सदस्यों पर देखभाल का अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है, जो देश की अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है।


वैश्विक स्तर पर भी स्थिति गंभीर होती जा रही है। दुनिया भर में इस समय लगभग 83 करोड़ वयस्क मधुमेह से जूझ रहे हैं, जिनमें से एक चौथाई से अधिक भारत में हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा रुझान नहीं बदले गए, तो 2050 तक यह संख्या 130 करोड़ तक पहुंच सकती है, जो आने वाले समय में स्वास्थ्य और आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चुनौती साबित होगी।


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