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सनातन धर्म( हिंदु धर्म ) क्या हैं? और क्यों हैं इसकी दुनिया में अलग महत्व ?

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हिंदू धर्म को सनातन क्यों कहते हैं? क्या है इस सनातन का असली अर्थ?सनातन का शाब्दिक अर्थ तो जगजाहिर है। इसका सामान्य रूप से मतलब होता है ‘जो हमेशा से मौज़ूद रहा है’ यानि जिसकी उत्पत्ति और जन्म से किसी का कोई सरोकार न हो और वह वस्तु या व्यक्ति या सिद्धांत नित्य हो। यानि अजन्मा जैसा धर्म या जीवन पद्धति, जिसके विकास की धारा अनवरत रही हो।

हिंदू धर्म के प्रमुख गुण है उदारता, सहिष्णुता व परोपकार जिससे हिन्दू धर्म का सदैव सरंक्षण होता रहा है। कुछ लोग सोचतें हैं कि अन्य धर्मों के प्रति उदारता तथा सहिष्णुता का भाव दिखाना हिन्दू धर्म की कमजोरी है जिसके कारण इस्लाम और मसीही मत के प्रचारकों ने कई हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन किया है। किन्तु यहाँ उल्लेखनीय है कि हिन्दुओं के इस्लाम और मसीही मत के अंतर्गत आने से इन धर्मों के मूलस्वरूप में कई परिवर्तन आ गए हैं। हिन्दू धर्म के अनेक आचार- विचार उनमें शामिल हो गए हिन्दुओं की जाति व्यवस्था भी भारतीय इस्लाम और मसीही मत में अच्छी तरह से प्रविष्ट और व्यवस्थित हो गयी।
सनातन धर्म को समझने से पहले सत और सनातन शब्दों को समझना जरूरी है।

सत का अर्थ है जो वस्तु या पदार्थ अनादि काल से है और जिस में कोई परिवर्तन नहीं होता। भारतीय दर्शन के अनुसार सत तीन प्रकार का संभव है

प्रथम प्रकृति, दूसरा जीवात्मा और तृतीय परमात्मा। इन तीनों की सत्ता हमेशा अनादि काल से है और रहेगी और इनमें किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं होता।

मूल प्रकृति से मिलकर प्राकृतिक वस्तुएं बनती है। जितनी भी प्राकृतिक चीजें हैं वह सब प्रकृति से ही बनती है। आत्मा और परमात्मा भी अक्षय, नित्य व शाश्वत हैं। इनका कोई बनाने वाला नहीं है। जब निर्माण ही नहीं है इनका नाश भी सम्भव नहीं है। ये तीनों ही अनादि अनश्वर हैं। अनादि का अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कोई प्रारंभ नहीं। एक सृष्टि के प्रलय के बाद पुनः सृष्टि होती है अतः सृष्टि प्रवाह से अनादि है और ये तीनों सत्ताएं भी नित्य व शाश्वत हैं।

इसके विपरीत असत से अभिप्राय उन पदार्थों और वस्तुओं से है जिसका नाश और निर्माण होता रहता है। उदाहरण के लिए सूरज चांद तारे शरीर मकान यह सारे बनते बिगड़ते रहते हैं। इस तरह की चीजों को असत कहा जाता है।

वेद परमात्मा की तरह नित्य सत्ता है परन्तु ध्यातव्य है कि वेदज्ञान परमात्मा से ही निसृत है। अतः सनातन धर्म का आधार वेद है।
हिन्दू धर्म किसी एक व्यक्ति को समस्त धर्म का प्रवक्ता या पैगम्बर नहीं मानता, यधपि वह प्रत्येक धर्म- प्रवक्ता या पैगम्बर की शिक्षा को महत्व देता है । जहाँ अन्य देशों के मतों ने धर्म को किसी एक व्यक्ति और उसकी परम्पराओं से जोड़ा वहीँ हिन्दू धर्म ने धर्म को उस रूप में प्रकट करने का प्रयत्न किया जीवन व परम्पराओं में विद्यमान रहते हुए भी एक सामान्य धर्म है जो व्यक्ति और समाज से निरपेक्ष है। हिन्दू धर्म अन्य धर्मो से अलग धर्म व मत में अंतर करता है। हिन्दू धर्म में भी अनेक मत है जैसे शंकराचार्य मत, रामानुज मत, अभिनवगुप्त मत आदि। इसी कारण हिन्दू धर्म के कई सम्प्रदाय है।

कंबोडिया का हिन्दू सम्राज्य : विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर परिसर तथा विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक कंबोडिया में स्थित है। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम ‘यशोधरपुर’ था। इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था। कंबोडिया में बड़ी संख्या में हिन्दू और बौद्ध मंदिर हैं, जो इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां भी हिन्दू धर्म अपने चरम पर था।
अफ्रीकी में हिन्दू : भगवान शिव कहां नहीं हैं? कहते हैं कण-कण में हैं शिव, कंकर-कंकर में हैं भगवान शंकर। कैलाश में शिव और काशी में भी शिव और अब अफ्रीका में शिव। साउथ अफ्रीका में भी शिव की मूर्ति का पाया जाना इस बात का सबूत है कि आज से 6 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीकी लोग भी हिंदू धर्म का पालन करते थे।
साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक एक गुफा में पुरातत्वविदों को महादेव की 6 हजार वर्ष पुरानी शिवलिंग की मूर्ति मिली जिसे कठोर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। इस शिवलिंग को खोजने वाले पुरातत्ववेत्ता हैरान हैं कि यह शिवलिंग यहां अभी तक सुरक्षित कैसे रहा।
हाल ही में दुनिया की सबसे ऊंची शिवशक्ति की प्रतिमा का अनावरण दक्षिण अफ्रीका में किया गया। इस प्रतिमा में भगवान शिव और उनकी शक्ति अर्धांगिनी पार्वती भी हैं।
सनातन धर्म में तो सेवा को धर्म का सार बताया गया है। जीवमात्र और प्रकृति की सेवा का भाव सनातन धर्म की पूजा पद्धति और मान्यताओं में निहित है। सनातन धर्म में सेवा और धर्म को पृथक कर नहीं समझा गया है। यह भी कह सकते हैं कि यदि सनातन धर्म में पूर्ण निष्ठा है, तो आचरण में किसी भी अंश में हो, सेवा भाव रहेगा ही। ”सेवा धर्म का आधार है” सनातन धर्म में इस भाव को बड़े ही विस्तार से उद्घाटित और प्रतिष्ठित किया है। संतजन अपने तप के प्रताप से बिना किसी प्रत्यक्ष सेवा कार्य के भी निरन्तर धर्म, प्रकृति और मानवता की सेवा करते रहे हैं। उनके आचरण और तपोनिष्ठ जीवन में एकमात्र परोपकार और सेवा का भाव ही दिखायी देता है, ऐसे अनेक प्रसंग शास्त्रों में उल्लिखित भी हैं।

किसी के सेवा कार्यों को देख कर उसके धार्मिक अथवा अधार्मिक होने की धारणा नहीं बनायी जा सकती किंतु इसमें संदेह नहीं कि धर्मपरायणजन जो भी कार्य करेंगे, उसमें सेवा का भाव अवश्य निहित होगा। अनेक दंत कथाओं में स्पष्ट वर्णन है कि अधार्मिक जन भी अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए सेवा का ढोंग बड़े जोरशोर से करते रहे हैं। सत्य है कि सेवा धर्म का सार है, परमात्मा का मार्ग है परन्तु ”सेवा परमो धर्म:” के भाव को समझना और धारण करना सहज नहींं है।

किसी महापुरुष का मत है धर्म से सेवा का भाव उत्पन्न होता है किंतु सेवा से धर्म उत्पन्न नहीं हो सकता। ईसाई धर्म में सेवा पर बहुत ज़ोर दिया है और सेवा को ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। स्वयं जीसस ने सेवा भाव को परमात्मा की प्राप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना है। जीसस की सेवा प्रेम का ही एक रूप है, या कहें प्रेम की पर्यायवाची है। जिस सेवा को जीसस ने परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया है, वह तो जीसस के प्रेम में निष्पादित हो रही है। सेवा, निर्मल भाव है और जहां इसमें कोई अर्थ अथवा स्वार्थ जोड़ दिया, सेवा का निर्मल भाव समाप्त हो जाएगा।

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