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पटना हाईकोर्ट ने बिहार में निरस्त किया विदेशी शराबबंदी कानून …

पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी पर राज्यसरकार को पटना हाईकोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। अदालत ने शराब कानून को असंवैधानिक करार देते हुए उत्पाद विभाग की अधिसूचना को निरस्त कर दिया। अदालत ने संशोधित कानून की धारा 19(4) को असंवैधानिक करार दिया। राज्य सरकार ने गत 5 अप्रैल को पूरे राज्य में अनुज्ञप्तिधारी किसी व्यक्ति द्वारा विदेशी शराब के थोक या खुदरा व्यापार और उपभोग पर रोक लगाने की अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना और उत्पाद कानून में किए गए संशोधन की वैधता को 15 अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर कर चुनौती दी गई थी। लंबी बहस के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था। चीफ जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी व जस्टिस नवनीति प्रसाद सिंह की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई की थी। इस दौरान आवेदकों और सरकार की ओर से दलीलें पेश की गई थीं। कोर्ट ने सरकार की ओर से पेश दलीलों पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए आदेश में कहा कि कोई भी कंपनी अपना व्यापार मुनाफे के लिए लगाती है, न कि परोपकार के लिए। स्थानीय बाजार को देखते हुए कंपनी उद्योग लगाती है। उद्योग में काम करने वाले कर्मियों की नौकरी जाने पर मुआवजा कौन देगा। इस बारे में सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। यहां तक कि वर्कर कहां जाएंगे, इस बारे में भी कुछ नहीं किया गया। कोर्ट का कहना था कि राज्य में बियर फैक्ट्री लगाने के लिए एक ओर सरकार ने स्पेशल इंसेंटिव दी। राज्य में शराब की बिक्री के लिए सरकार ने लाइसेंस जारी किया। कोर्ट ने ताड़ी पर प्रतिबंध नहीं लगाए जाने पर कहा कि जब ताड़ी उत्पाद कानून के तहत है तो उस पर प्रतिबंध नहीं लगाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। कोर्ट का कहना था कि विदेशी शराब व बियर पीने के बजाए ताड़ी पीने की छूट सरकार ने दी है, जो अपने आप में गैरकानूनी कार्रवाई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई व्यक्ति शराब की बोतल लेकर बिहार के रास्ते दूसरे राज्य में जा रहा है तो उसे भी पकड़ा जा रहा है। जबकि सरकार की अधिसूचना में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है। इस कारण भी अधिसूचना निरस्त होने लायक है। अदालत ने शराब को लेकर सजा के प्रावधान पर भी सवाल खड़ा करते हुए कहा कि सजा का प्रावधान काफी कठोर रखा गया है। सजा का प्रावधान अपराध को देखते हुए रखा जाता है, लेकिन दस वर्ष की सजा के साथ-साथ एक लाख से लेकर दस लाख तक का जुर्माना लगाना और घर से शराब की बरामदगी पर घर जब्त करने का प्रावधान किया जाना भी सही नहीं है। अदालत ने इन सभी बिंदुओं पर विचार कर सरकार के संशोधन कानून को असंवैधानिक करार देते हुए 5 अप्रैल की अधिसूचना को निरस्त कर दिया। आवेदकों की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि किसी भी व्यक्ति को खाने-पीने की मनाही करने का अधिकार सरकार को नहीं है। संविधान ने खाने-पीने की छूट दे रखी है। एक ओर सरकार ने विदेशी शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस जारी किया और लाइसेंस फीस जमा करवाई। शराब का कोटा लेने के लिए सभी को पैसा जमा कर कोटा उठाने का निर्देश दिया। कई लाइसेंसधारियों ने इसके बाद बाजार में शराब की बिक्री शुरू की। इसी बीच एकाएक अधिसूचना जारी कर शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। आवेदकों ने कहा कि ताड़ी भी उत्पाद कानून के तहत आता है, लेकिन उस पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया। कोर्ट को बताया गया कि बियर के उत्पादन पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया, लेकिन उसकी बिक्री एवं उपभोग पर प्रतिबंध लगाया गया। यहां तक कि एक जगह से दूसरी जगह ले जाने पर भी रोक लगा दी गई। फिर उत्पादन का क्या मतलब? वहीं, राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उत्पादन करने से किसी को नहीं रोका गया। लेकिन स्थानीय बाजार सहित बिहार में बिक्री पर रोक लगाई गई। उत्पादित शराब को अन्य राज्य में ले जाने पर मनाही नहीं है। पूर्व सैनिकों को भी शराब नहीं देने के बारे में सैन्य अधिकारियों से बात की गई है। सैनिक छावनी परिसर में शराब पीने पर मनाही नहीं है, लेकिन परिसर से बाहर आते ही राज्य सरकार का कानून उनपर लागू हो जाएगा। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि शराब बरामदगी पर पूरे गांव व शहर पर जुर्माना लगाने का प्रावधान कैसे लागू होगा, इस बारे में संशोधित कानून में कुछ भी नहीं कहा गया है। यहां तक कि जुर्माने को चुनौती देने का प्रावधान भी नहीं है। यह प्रावधान टुकड़ा में वास्तविक कानून है जो बगैर मार्गदर्शन के है। कोर्ट ने माना कि प्रावधान पूर्णत: अस्पष्ट, अनिश्चित और असीमित है। अदालत ने इसे भी अनुच्छेद 14 व 21 का उल्लंघन बताया। शराबबंदी कानून पर फैसला सुनाने के दौरान खाने-पीने के मुद्दे पर चीफ जस्टिस आईए अंसारी और जस्टिस एनपी सिंह के बीच मतभेद दिखा। जस्टिस सिंह ने शराब पीने को मौलिक अधिकार माना, जबकि चीफ जस्टिस ने यह बात मानने से इनकार कर दिया। साथ ही कहा कि राज्य सरकार अल्कोहल पर प्रतिबंध लगा सकती है, लेकिन संविधान के दायरे में रहकर।

 

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